TCS के एक मैनेजर कह रहे थे कि भारतीय मार्किटिंग में बहुत कमज़ोर हैं वर्ना कोई कारण नहीं भारत iPod जैसे उत्पाद खुद बना और दुनिया में बेच न सके। वे कह रहे थे (मैं आंकड़े भूल गया हूँ) कि स्वीडन की काम करने वाली आबादी दिल्ली की ग्रेटर कैलाश कोलोनी से बड़ी नहीं फिर भी उनकी प्रति व्यक्ति आय भारतीयों से कई हज़ार गुना अधिक है। वे थोड़े से लोग अपने उत्पाद कैसे सारे देशों में बेच पाते हैं।
उनका कहना था कि भारतीयों को पढ़ाई में केवल सही उत्तर देना सिखाया जाता है, सही प्रश्न पूछना नहीं। यह तो अब पढ़ने में भी बहुत आता है कि ज्ञान महत्वपूर्ण नहीं है, आपके विचार, उद्देश्य और सोच महत्वपूर्ण है। क्योंकि ज्ञान की न तो कोई सीमा है, न ही किसी एक व्यक्ति को हर तरह का पूर्ण ज्ञान हो सकता है।
Friday, August 14, 2009
Sunday, August 09, 2009
हिंदी शब्दकोष बनाने के लिए छोटा सा अनुप्रयोग
किसी लेख के सभी शब्द अलग अलग और क्रमबद्ध करके सूची के रूप दिखाने के लिए ये छोटी सी स्क्रिप्ट बनाई है जो अब ठीक काम कर रही है। इससे अभी विभिन्न ब्लॉगों पर जाकर लगभग 3600 हिंदी शब्दों की यह सूची बनाई है, आज़माने के लिए। यह हिंदी शब्दकोष बनाने के काम आ सकती है। आज़माएं।
Saturday, August 08, 2009
पश्चिमी विश्व भारत में ईसाई धर्म के प्रसार पर उतारू
ईसाई धर्म ने भारत में कैसे पाँव फैला रखे हैं, ये यहां जर्मनी में देखने को मिलता है। भारत संबंधी तमाम सरकारी और गैर सरकारी आयोजनों में खुले आम ईसाई संस्थाओं को सहायता दी जाती है। एक ओर जर्मनी का संविधान कहता है कि धर्म सरकार से अलग है और दूसरी ओर दूसरे देशों में 'गैर सरकारी संस्थाओं' (NGO) द्वारा ईसाई धर्म फैलाने का काम किया जाता है। यहां तक कि कर्मचारियों की आय में चर्च के लिए टैक्स भी काटा जाता है। जो टैक्स नहीं देता उसे 'चर्च से बाहर निकाल दिया जाता है' और उसकी मृत्यु पर पादरी द्वारा प्रार्थना नहीं की जाती। ये अलग बात है कि बहुत लोग चर्च से अपना विश्वास खोते जा रहे हैं और चर्च टैक्स नहीं देते। वैसे भी मैंने सुना है कि चर्च टैक्स का पैसा पोप को नहीं जाता, यहीं पर उपयोग किया जाता है।
मेरी आँखों देखी बहुत सी घटनाएँ हैं जिनका वर्णन मैं धीरे धीरे करूँगा। फिलहाल 18 मई को म्युनिक में भारत से दलितों के लिए लड़ने वाली 'रुथ मनोरमा' के सेमिनार का वर्णन करना चाहूँगा। वे पिछले साल भी यहां आई थीं तो उन्हें देख नहीं पाया। सोचा इस बार उनके सेमिनार में जाऊँ। वहां गया तो बहुत निराशा हुई। वे हिंदुओं के विरुद्ध बहुत बोल रहीं थी, जैसे कि उनकी मां हिंदू थी लेकिन पिछड़ी जाति की थीं, इसलिए वे पढ़ाई की हक़दार नहीं थीं, इसलिए उन्होंने धर्म बदल लिया। समझ नहीं आ रहा था कि वे दलितों के लिए बोल रही हैं या हिंदुओं के विरुद्ध, या फिर बीच बीच में केवल दलित औरतों के लिए। शायद वे भारत में ईसाई संस्था 'Bread for the World' के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ये संस्था कहने को तो पिछड़े राष्ट्रों में ग़रीबों के लिए रोटी का प्रबंध को अपना उद्देश्य बताती है पर ईसाई धर्म का प्रसार ही इसका मुख्य काम है।


वहां पर कई दिनों तक भारत में दलितों की हालत पर प्रदर्शनी भी आयोजित हुई जिसमें लगे पोस्टरों को पढ़कर बहुत आक्रोश हुआ। लगता है पश्चिमी विश्व हाथ धो कर भारत और हिंदुओं के पीछे पड़ा है। वह इसे तार तार कर देना चाहता है। विदेशों में नियुक्त अपने सरकारी बाबू भी आँख मूंद कर सब नज़रअंदाज़ कर देते हैं। खुले-आम विदेशों में इतना कुछ होता रहता है, वे कोई कार्यवाही ही नहीं करते। मेरी रुथ मनोरमा और आयोजकों से इस सेमिनार में थोड़ी भिड़ंत हो गई। मैंने पूछा कि अगर आप भारतीय सरकार के साथ दलितों के बारे में बात करना चाहते हैं तो म्युनिक स्थित भारतीय कोंसल को इस आयोजन में क्यों नहीं बुलाया, तो उनका उत्तर था कि हमने खुला आमंत्रण दिया है, जो आना चाहता है, आ सकता है। उन्होंने और कहा कि पिछले वर्ष बर्लिन में भारतीय दूतावास के सामने उन्होंने प्रदर्शन किया था। आयोजन के बाद एक आयोजक से थोड़ी बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि हम अमरीकी संस्थाओं की तरह नहीं जो धर्मांत्रण करने के बाद लोगों की खबर नहीं लेते। वे दावे तो बड़े बड़े करते हैं कि हमने दस हज़ार लोगों का धर्मांत्रण कर दिया लेकिन बाद में उन लोगों का क्या होता है, वे ध्यान नहीं देते। लेकिन ये सब सुनते समय मुझे लगा कि क्या हमारे देश में लोग और सरकार क्या सोए रहते हैं। केवल संविधान में धर्म-निरपेक्ष देश घोषित होने पर लोग इसका कितना नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। रुथ मनोरमा ने तो मुझे धमकी दी कि तुम्हारी रिपोर्ट मुझे दिखाना, अगर उसमें एक भी ग़लती हुई तो भारत में मैं तुम पर एक्शन लूँगी।
अफ़सोस कि पोडियम पर सबसे दाएँ बैठी औरत हमारी गायक मंडली की पूर्व सदस्य हैं (नीचे चित्र में सबसे दाएँ देखिए) और स्थानीय रेडियो स्टेशन की रिपोर्टर हैं। पिछले साल भी रुथ मनोरमा म्युनिक में आईं थी और उस बार भी उन्होंने आयोजन का क्रियांवन किया था। मुझे बाद में पता चला और हमने बसेरा पर इसके बारे में लिखा भी। अब मुझे इसका पछतावा हो रहा है।

और एक घटना। 28 जुलाई बायरन प्रांत में खुले 'बायरन भारतीय केंद्र' के उद्घाटन समारोह में खुले आम चर्च के प्रतिनिधियों को बुलाया गया और संबोधित किया गया। यह केंद्र भारत और बायरन के बीच छात्रों के आदान प्रदान के लिए बनाया गया है तो इसका चर्च के साथ क्या संबंध। अपने नए महादूत श्री सुधीर व्यास ये सब सुनते रहे। शायद उनको जर्मन भाषा समझ ही नहीं आ रही होगी। आती भी हो तो वे कुछ नहीं बोलते। आखिर वे मुख्य अतिथि थे तो आयोजन की भाषा अंग्रेज़ी क्यों नहीं रखी गई। इस पर भी विचार होना चाहिए। ज़ाहिर है कि ये केंद्र और ये आयोजन भारत के हित में कतई नहीं था। केरल में ईसाई धर्म का गढ़ है। वहां भी चर्च के प्रतिनिधि केरल के एक भारतीय ही थे। उनसे खास बातचीत नहीं हो पाई, अफ़सोस। मेरा मन नहीं लगा, जल्दी आ गया। विदेश में अपने देश के विरुद्ध इतना कुछ होते देख हताशा होने लगती है। अफ़सोस है कि अपने लोग कुछ नहीं समझते, सबको अपनी अपनी पड़ी है।
मेरी आँखों देखी बहुत सी घटनाएँ हैं जिनका वर्णन मैं धीरे धीरे करूँगा। फिलहाल 18 मई को म्युनिक में भारत से दलितों के लिए लड़ने वाली 'रुथ मनोरमा' के सेमिनार का वर्णन करना चाहूँगा। वे पिछले साल भी यहां आई थीं तो उन्हें देख नहीं पाया। सोचा इस बार उनके सेमिनार में जाऊँ। वहां गया तो बहुत निराशा हुई। वे हिंदुओं के विरुद्ध बहुत बोल रहीं थी, जैसे कि उनकी मां हिंदू थी लेकिन पिछड़ी जाति की थीं, इसलिए वे पढ़ाई की हक़दार नहीं थीं, इसलिए उन्होंने धर्म बदल लिया। समझ नहीं आ रहा था कि वे दलितों के लिए बोल रही हैं या हिंदुओं के विरुद्ध, या फिर बीच बीच में केवल दलित औरतों के लिए। शायद वे भारत में ईसाई संस्था 'Bread for the World' के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ये संस्था कहने को तो पिछड़े राष्ट्रों में ग़रीबों के लिए रोटी का प्रबंध को अपना उद्देश्य बताती है पर ईसाई धर्म का प्रसार ही इसका मुख्य काम है।
वहां पर कई दिनों तक भारत में दलितों की हालत पर प्रदर्शनी भी आयोजित हुई जिसमें लगे पोस्टरों को पढ़कर बहुत आक्रोश हुआ। लगता है पश्चिमी विश्व हाथ धो कर भारत और हिंदुओं के पीछे पड़ा है। वह इसे तार तार कर देना चाहता है। विदेशों में नियुक्त अपने सरकारी बाबू भी आँख मूंद कर सब नज़रअंदाज़ कर देते हैं। खुले-आम विदेशों में इतना कुछ होता रहता है, वे कोई कार्यवाही ही नहीं करते। मेरी रुथ मनोरमा और आयोजकों से इस सेमिनार में थोड़ी भिड़ंत हो गई। मैंने पूछा कि अगर आप भारतीय सरकार के साथ दलितों के बारे में बात करना चाहते हैं तो म्युनिक स्थित भारतीय कोंसल को इस आयोजन में क्यों नहीं बुलाया, तो उनका उत्तर था कि हमने खुला आमंत्रण दिया है, जो आना चाहता है, आ सकता है। उन्होंने और कहा कि पिछले वर्ष बर्लिन में भारतीय दूतावास के सामने उन्होंने प्रदर्शन किया था। आयोजन के बाद एक आयोजक से थोड़ी बातचीत हुई तो उन्होंने कहा कि हम अमरीकी संस्थाओं की तरह नहीं जो धर्मांत्रण करने के बाद लोगों की खबर नहीं लेते। वे दावे तो बड़े बड़े करते हैं कि हमने दस हज़ार लोगों का धर्मांत्रण कर दिया लेकिन बाद में उन लोगों का क्या होता है, वे ध्यान नहीं देते। लेकिन ये सब सुनते समय मुझे लगा कि क्या हमारे देश में लोग और सरकार क्या सोए रहते हैं। केवल संविधान में धर्म-निरपेक्ष देश घोषित होने पर लोग इसका कितना नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। रुथ मनोरमा ने तो मुझे धमकी दी कि तुम्हारी रिपोर्ट मुझे दिखाना, अगर उसमें एक भी ग़लती हुई तो भारत में मैं तुम पर एक्शन लूँगी।
अफ़सोस कि पोडियम पर सबसे दाएँ बैठी औरत हमारी गायक मंडली की पूर्व सदस्य हैं (नीचे चित्र में सबसे दाएँ देखिए) और स्थानीय रेडियो स्टेशन की रिपोर्टर हैं। पिछले साल भी रुथ मनोरमा म्युनिक में आईं थी और उस बार भी उन्होंने आयोजन का क्रियांवन किया था। मुझे बाद में पता चला और हमने बसेरा पर इसके बारे में लिखा भी। अब मुझे इसका पछतावा हो रहा है।
और एक घटना। 28 जुलाई बायरन प्रांत में खुले 'बायरन भारतीय केंद्र' के उद्घाटन समारोह में खुले आम चर्च के प्रतिनिधियों को बुलाया गया और संबोधित किया गया। यह केंद्र भारत और बायरन के बीच छात्रों के आदान प्रदान के लिए बनाया गया है तो इसका चर्च के साथ क्या संबंध। अपने नए महादूत श्री सुधीर व्यास ये सब सुनते रहे। शायद उनको जर्मन भाषा समझ ही नहीं आ रही होगी। आती भी हो तो वे कुछ नहीं बोलते। आखिर वे मुख्य अतिथि थे तो आयोजन की भाषा अंग्रेज़ी क्यों नहीं रखी गई। इस पर भी विचार होना चाहिए। ज़ाहिर है कि ये केंद्र और ये आयोजन भारत के हित में कतई नहीं था। केरल में ईसाई धर्म का गढ़ है। वहां भी चर्च के प्रतिनिधि केरल के एक भारतीय ही थे। उनसे खास बातचीत नहीं हो पाई, अफ़सोस। मेरा मन नहीं लगा, जल्दी आ गया। विदेश में अपने देश के विरुद्ध इतना कुछ होते देख हताशा होने लगती है। अफ़सोस है कि अपने लोग कुछ नहीं समझते, सबको अपनी अपनी पड़ी है।
आलेख में से ईमेल पते निकालना
किसी टेक्स्ट में से ईमेल पते निकालने के लिए किसी ऑनलाइन अनुप्रयोग की ज़रूरत बहुत देर से थी। आखिर इंटरनेट में से एक PHP सक्रिप्ट मिल गई जिसे अपने वेबसाइट में ढाल लिया। वह सफ़लतापूर्वक काम कर रही है। डिब्बे में कोई भी टेक्स्ट डाल कर बटन दबाने से खाली ईमेल पते अल्पविराम चिन्ह के साथ अलग होकर प्रकट हो जाते हैं। इन्हें सीधे किसी ईमेल प्रोग्राम में उपयोग किया जा सकता है।
स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए उत्तम खेल
जर्मनी की Ravensburger कंपनी बच्चों के बहुत आकर्षक और शिक्षावर्धक खेल बनाती है। अभी हाल ही में मेरी पाँच वर्षीय बेटी को उपहार में मिला यह खेल को खेलने में मुझे भी बहुत मज़ा आता है।

Nanu नामक ये खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत उपयोगी है। सबसे बड़ी बात ये खेल चार साल का बच्चा भी सीख सीख और खेल सकता है और बड़ों को भी यह खेल खेलने में मज़ा आता है, क्योंकि बच्चों की स्मरण शक्ति शायद सामान्यतः अधिक रहती है। इसमें कोई पाँच सेंटीमीटर व्यास के गत्ते के चौबीस कार्ड रहते हैं जिन पर अलग अलग चित्र बने होते हैं जैसे गुब्बारा, हाथी, हवाई जहाज़, भालू आदि। पाँच अलग अलग रंग के प्लास्टिक के ढक्कन होते हैं जो इन कार्डों को ढकने के काम आते हैं। एक रंगीन पांसा होता है जिसके पाँच ओर ढक्कनों वाले पाँचों रंग होते हैं, जैसे लाल, पीला, नीला, हरा और संतरी, और छठी ओर जोकर बना होता है। इसे दो से चार लोग खेल सकते हैं। खेल के शुरू में सारे कार्ड मेज़ पर बिखरा दिए जाते हैं और कोई पाँच कार्ड पाँचों ढक्कनों से ढंक दिए जाते हैं। एक खिलाड़ी पांसा फेंकता है। जो रंग आए उस रंग के ढक्कन के नीचे का चित्र उसको बूझना होता है। अगर ठीक तो कार्ड उसका, और ढक्कन किसी नए चित्र पर रख दिया जाता है, नहीं तो अगले खिलाड़ी की बारी। अगली बारी में अंतिम देखा गया रंग नहीं गिना जाता, क्योंकि वह ताज़ा ताज़ा मन में याद होता है। जोकर के आने पर खिलाड़ी कोई भी ढक्कन उठा सकता है, अंतिम वाले को छोड़कर। जिसके पास सबसे अधिक कार्ड, वह जीत गया।

Nanu नामक ये खेल स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए बहुत उपयोगी है। सबसे बड़ी बात ये खेल चार साल का बच्चा भी सीख सीख और खेल सकता है और बड़ों को भी यह खेल खेलने में मज़ा आता है, क्योंकि बच्चों की स्मरण शक्ति शायद सामान्यतः अधिक रहती है। इसमें कोई पाँच सेंटीमीटर व्यास के गत्ते के चौबीस कार्ड रहते हैं जिन पर अलग अलग चित्र बने होते हैं जैसे गुब्बारा, हाथी, हवाई जहाज़, भालू आदि। पाँच अलग अलग रंग के प्लास्टिक के ढक्कन होते हैं जो इन कार्डों को ढकने के काम आते हैं। एक रंगीन पांसा होता है जिसके पाँच ओर ढक्कनों वाले पाँचों रंग होते हैं, जैसे लाल, पीला, नीला, हरा और संतरी, और छठी ओर जोकर बना होता है। इसे दो से चार लोग खेल सकते हैं। खेल के शुरू में सारे कार्ड मेज़ पर बिखरा दिए जाते हैं और कोई पाँच कार्ड पाँचों ढक्कनों से ढंक दिए जाते हैं। एक खिलाड़ी पांसा फेंकता है। जो रंग आए उस रंग के ढक्कन के नीचे का चित्र उसको बूझना होता है। अगर ठीक तो कार्ड उसका, और ढक्कन किसी नए चित्र पर रख दिया जाता है, नहीं तो अगले खिलाड़ी की बारी। अगली बारी में अंतिम देखा गया रंग नहीं गिना जाता, क्योंकि वह ताज़ा ताज़ा मन में याद होता है। जोकर के आने पर खिलाड़ी कोई भी ढक्कन उठा सकता है, अंतिम वाले को छोड़कर। जिसके पास सबसे अधिक कार्ड, वह जीत गया।
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