Monday, April 25, 2011

गुरुद्वारे में हिंदुओं के विरुद्ध कविता

कल म्युनिक के गुरुद्वारे में एक बच्चे ने भिंडरावाले के गुनगान में और हिंदुओं के विरुद्ध एक कविता बोली। किसी ने कुछ नहीं कहा। मैंने बाद में विरोध किया। तो कुछ लोगों ने उस बच्चे को समझाया। उसके पिता शायद वहां नहीं थे। गुरुदरे वालों को शायद पता भी नहीं था कि वह कैसी कविता बोलने जा रहा है। गुरुद्वारों में अभी ऐसी प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई जिसमें ग्रंथी अथवा अन्य लोग लगातार लड़ाई की बातें करके लोगों को हिंदुओं के विरुद्ध भड़काते हैं।

लगता है सिख पंथ की शक्ति हिंदुओं को गालियां निकालने में ही है। सभी पंजाबी जालस्थल हिंदु विरोधी साहित्य से भरे पड़े हैं। जब कोई मुसीबत आती है तो वे indian indian कहकर मदद मांगने लगते हैं, वर्ना हिंदु-सिख पर राजनीति खेलते रहते हैं। एक ओर कहते हैं गुरुद्वारों में हिंदुओं का भी स्वागत है दूसरी ओर गुरुद्वारों में हिंदू विरोधी कीर्तन, पाठ, कविातएं सुनाते रहते हैं। पंजाबी की आड़ में वे केवल सिखों की बात करते हैं जबकि पंजाब में मेरे जैसे अनेक पंजाबी भाषी हिंदू भी रहते हैं।

2 टिप्पणियाँ:

ePandit ने कहा…

कमाल है एक पंथ जिसका स्थापना गुरु गोबिन्द सिंह जी ने धर्म की रक्षा के लिये की थी (उस समय हिन्दू सिक्ख कोई अलग नहीं थे, उस समय के सभी मुगल दस्तावेजों में गुरुओं को हिन्दू संत कहा गया है), आज उस पंथ के कुछ लोग हिन्दुओं का विरोध करके अपने धर्म की जड़ पर ही संहार कर रहे हैं।

IG ने कहा…

मेरा मान्ना है कि मत भेद पैदा करने वाले धर्म के ठेकेदार हि होते हैं, वहि ऐक आम ईन्सान के दिल मे ऐक दुसरे के परति रंजिश पैदा करते है. बाकि हिन्दु या सिक्ख मे आम आदमी के दिल मे कोई रंजिश नही है. अपनि कुर्सि या Power बनाये रखने के लिये हि सब कुछ चल रहा है.