इस पोस्ट में मैं उन चिट्ठों के नाम लिखना शुरू कर रहा हूँ जिनमें टिप्पणी मालिक की अनुमति के बाद ही परदर्शित होती है। इन चिट्ठों पर दोबारा टिप्पणी नहीं की जायेगी। टिप्पणी करने से पहले इस पोस्ट पर नज़र मारी जायेगी।
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Monday, December 03, 2007
इन चिट्ठों पर टिप्पणी नहीं
Saturday, December 01, 2007
देवनागरी प्रेम या रोमन से परहेज?
प्रिंट मीडिया से जुड़े लोगों में ये प्रवृत्ति अक्सर देखने को मिलती है कि हिन्दी लिखते समय वे विदेशी व्यक्तियों, स्थानों अथवा चीज़ों (जैसे किताबें) के नाम भी देवनागरी में लिखते हैं। जिससे उसका उच्चारण तो समझ में आता है लेकिन अगर हम गूगल आदि द्वारा उस व्यक्ति, स्थान अथवा चीज़ के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहें तो लगभग असंभव होता है। उदाहरण के लिये 'मैन ऑफ द आयरन मास्क, निकोलस फुके, यूस्ताश डॉगर, श्राउड ऑफ ट्यूरिन' शब्दों का आप क्या कर सकते हैं? केवल पढ़ सकते हैं। इसकी जगह, या कम से कम साथ में ब्रेकेट में man of the iron mask, Nicolas Fouquet, Shroud of Turin भी लिखा हो तो छानबीन करना कितना आसान हो। ये तो पढ़ाते हुये भी अनपढ़ रखने वाली बात हो गयी। सूचना है पर किसी काम की नहीं। खासकर आज समय इंटरनेट का है जिससे अधिक जानकारी के लिये खोजना बहुत आसान हो गया है, लेकिन पता तो हो कि इन नामों को रोमन में कैसे लिखा जाता है। शायद प्रिंट मीडिया की मजबूरी आज भी फ़ॉंट के साथ काम करने की है, और वो बार बार फ़ॉंट लगाने हटाने से घबराते होंगे। लेकिन युनिकोड में तो ये बार बार फ़ॉंट बदलने की मजबूरी नहीं है। वे कम से कम इंटरनेट पर तो इसे सुधार सकते हैं। प्रिंट मीडिया के लिये लिखने के आदि बहुत सारे हिन्दी ब्लॉगर ब्लॉगों पर भी इसी प्रवृत्ति को जारी रखे हुये हैं। ऐसी जानकारी का क्या फ़ायदा जो किसी काम न आ सके, जो हिन्दी पढ़ने वालों को किसी दूसरे ग्रह का प्राणी बना कर रखे। शायद हिन्दी प्रिंट मीडिया के युनिकोड अपनाने के बाद ये प्रवृत्ति बदलने लगे। कब आयेगा वो समय?
अभिनय अभ्यास-8--तीन खिलाड़ी
इस खेल का उद्देश्य मैं साफ़ तौर पर तो नहीं कह सकता लेकिन मोटे तौर पर यही है कि आपके दिमाग में तुरंत कितनी उपयुक्त चीज़ें और शब्द आ सकते हैं। इसमें सभी सदस्य तीन तीन के समूहों में वितरित हो जाते हैं। एक सदस्य कुछ करने का नाटक करता है, साथ में बोलता है कि वो कौन है और क्या कर रहा है। दूसरे को उससे मिलता जुलता और उस कल्पना को आगे बढ़ाने के लिये कुछ करना होता है, साथ में बोलना होता है कि वो कौन है और वो क्या कर रहा है। तीसरे सदस्य को भी यही करना होता है। फिर पहला सदस्य अन्य दो में से किसी एक को लेकर अलग हो जाता है। बचा हुआ सदस्य अपनी क्रिया और कथन दोहराता है। फिर से दूसरे दोनों सदस्यों को वही खेल आगे बढ़ाना है कुछ नया सोच कर।
उदाहरण के लिये, पहला सदस्य बाल कंघी करने का नाटक करता है, और कहता है, मैं व्यक्ति हूँ और कंघी कर रहा हूँ। तो दूसरा उसके सामने खड़ा हो सकता है और कह सकता है, मैं शीशा हूँ। तीसरा सदस्य पहले सदस्य के सिर के आस पास मंडरा सकता है और कह सकता है, मैं कंघा हूँ। फिर मान लीजिये पहला सदस्य दूसरे (यानि शीशे) को लेकर अलग हो जाता है (ये कहकर कि मैं शीशे को साथ ले रहा हूँ)। फिर तीसरा सदस्य हिल जुल कर दोहराता है कि मैं कंघा हूँ। फिर अन्य दो में से किसी एक को चल रही कंघी से मिलता जुलता कुछ करना है। जैसे वो ये कहकर आगे आ सकता है कि मैं लड़की हूँ और कंघी कर रही हूँ। फिर बचा हुआ सदस्य लड़की के पास आकर बैठ सकता है और कह सकता है कि मैं लड़की का प्रेमी हूँ और उससे प्यार कर रहा हूँ आदि। ये खेल जितनी देर तक चला सकें चलायें, आप इसका आनंद और मुश्किल महसूस करेंगे।
HTML tip-स्वचलित कड़ी
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