सेक्स क्या के संचालक रमाशंकर शर्मा जी ने मुझे नारद चलाने वालों में से एक समझ कर ईमेल करके नारद के साथ जोड़ने के लिए आग्रह किया था। इसलिए मैं एक बार इस बेहद उपयोगी ब्लॉग को नारद में जोड़ने के लिए आग्रह करने के लिए ये पोस्ट लिख रहा हूँ। इस तरह की सामग्री अभी तक हिन्दी में उपलब्ध नहीं है। मेरे ख्याल से हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में यह ब्लॉग बहुत मदद कर सकता है। बाकी मालिकों की मर्ज़ी।
Thursday, May 17, 2007
एक और फ़ीड रीडर
मैं भी एक कम चलाऊ फ़ीड रीडर बना रहा हूँ। काम चलाऊ का अर्थ बाद में। पहले प्लस पवाईँट। आप साईट पर पंजीकृत होने के बाद खुद अपनी मर्ज़ी से ब्लॉग जोड़ या हटा सकते हैं। लेकिन इस सारे काम में अभी थोड़ा समय लगेगा।
अब काम चलाऊ इसलिए क्योंकि ये मैंने खुद बनाया है PHP के कुछ फ़ंक्शन इस्तेमाल करके। अभी यह स्वचलित नहीं है। यानि इसे दिन में एक या दो बार खुद रिफ़्रेश करना पड़ता है। लेकिन समय के साथ साथ स्वचलित भी हो जाएगा।
इसके दो हिस्से हैं। एक तो ये जहां आप एक ब्लॉग की सारी पोस्ट देख सकते हैं और एक ये जो सारे ब्लॉगों को मिश्रित कर chronological order में दिखाता है। दोनों एक ही ब्लॉग सूची से चलते हैं।
साईट पर पंजीकृत होने के और कुछ फ़ायदे। आप फ़ॉंट परिवर्तक का उपयोग कर सकते हैं। इससे आप ढेर सारे फ़ॉंटों में लिखे हुए हिन्दी लेखों को युनिकोड में परिवर्तित कर सकते हैं जैसे अमर उजाला, भास्कर, वेब दुनिया, शुषा, कृतिदेव, सुरेख, चाण्कय आदि। और आप साईट के फ़ोरम का उपयोग कर सकते हैं। समय के साथ और भी बहुत कुछ आएगा। क्या कहते हैं आप?
Tuesday, May 15, 2007
streaming server
एक साल से अधिक हो गया streaming server से जूझते हुए। कभी चल पड़ता है, कभी बंद हो जाता है। अब तो उस भाई को पूछना ही छोड़ दिया जो ये सर्वर चलाता है। शायद उसने शर्म खाकर खुद ही दोबारा शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि अब ये चलता रहेगा। अभी कुछ गाने अपलोड किए हैं जो मुझे CD / mp3 में नहीं मिले। इसलिए कैसेट से रिकार्ड किए हैं। इसलिए क्वालिटी इतनी अच्छी नहीं है। कुछ बहुत पुराने गाने हैं, कुछ अस्सी के दशक के, और कुछ 2000 के बाद के। सुनकर देखिए, उम्मीद है आपको अधिकतर गाने पसंद आएंगे।
http://radio.rajneesh-mangla.de:8082/listen.pls
आप यहां भी देख सकते हैं।
Sunday, May 13, 2007
मेरा देश मेरा गाँव
अगर मैं किसी भारतीय से या पूछूँ कि उसे भारतीय समाज और जर्मन समाज में क्या फ़र्क लगता है तो उसका पहला उत्तर तो ये होता है कि उसका परिवार तो भारत में है, इसलिए उसका मन वहां अधिक लगता है। उसे बताना पड़ता है कि समाज के फ़र्क के बारे में पूछ रहा हूँ न कि उसकी कहानी के बारे में (वो अलग बात है कि लोग जर्मनी को लाख गालियां देने के बावजूद यहां से वापस नहीं जाते)। फिर वो कहता है वहां परिवार में आपसी मेल मिलाप अधिक होता है, संबन्ध अधिक घनिष्ठ होते हैं। माता पिता का ताउम्र ध्यान रखा जाता है। शदियां जल्दी टूटती नहीं हैं। फिर भी न जाने क्यों मुझे बार बार लगता है कि हम बातें कुछ भी करें, हमारा समाज यहां से सदियों पीछे है और रहेगा। इसका मूल कारण मुझे भाषा ही लगता है। जितनी गहराई से मैं ये सब महसूस करता हूँ, उतनी गहराई, सच्चाई से कह पाने और लिखने की काबलियत नहीं है मुझमें। धीरे धीरे चर्चा करेंगे इन बातों पर। आप क्या सोचते हैं?
हिन्दी चिट्ठाकारी और युनिकोड
हैरानी की बात है कि हिन्दी चिट्ठाकारी को लेकर मीडिया में इतनी हलचल हो रही है, इतने लेख लिखे जा रहे हैं लेकिन युनिकोड का ज़िक्र तक नहीं। तकनीक का इतना बड़ा बदलाव पूरा का पूरा नज़रअंदाज़ हो रहा है। और युनिकोड केवल लिखने या ब्लॉगिंग के लिए नहीं बल्कि इससे आने वाली तमाम तकनीकी दुनिया बदल सकती है। न ही ये केवल हिन्दी तक सीमित है जो पत्रकार लोग हिन्दी का ढोल पीट रहे हैं। युनिकोड के 10000 अक्षरों में से करीब केवल 100 अक्षर हिन्दी के हैं। मतलब हिन्दी के साथ साथ और कई भाषाओं के समृद्ध होने की भी पूरी संभावना है। फिर उसका ज़िक्र भी क्यों नहीं। ज़ाहिर है कि ये पत्रकार लोग न ही इस नई तकनीक को ढंग से समझते हैं न ही इसके महत्व को। आशा है कि युनिकोड नज़दीकी भविष्य में हमारे उद्योगों और शिक्षा प्रणाली में पूरी तरह बस जाएगी। तब ये जो अभी बहुत उछल कूद मच रही है, एक सामान्य बात हो जाएगी।
