Saturday, November 17, 2007

विदेशियों के लिए अधिक शुल्क

मेरी पिराबलम ये है कि मैंने भारत में भी बहुत कम पर्यटन किया है। बहुत से महत्वपूर्ण स्थान देखे नहीं हुए। कुछ दिन पहले किसी मित्र से बात होने पर पता चला कि भारत में पर्यटन / एतिहासिक स्थलों का प्रवेश शुल्क भारतीयों और विदेशियों के लिए अलग अलग है। भारतीयों के लिए 15-20 रुपए और विदेशियों के लिए 10-15 डालर। तर्क ये कि विदेशियों की कमाई औसत भारतीय से अधिक होती है। मुझे बहुत धक्का लगा। यानि एक तो हम खुलेआम ढिंढोरा पीट रहे हैं कि हम गरीब हैं, दूसरे हम विदेशियों पर भेदभाव के इल्ज़ाम लगाते रहते हैं पर खुद भेदभाव करने से पीछे नहीं हटते।

आज खबर पढ़ी कि विदेशी अब भुगतान डालर में नहीं रुपयों में ही करेंगे लेकिन भारतीयों से कोई दस गुणा अधिक। ये एक ही देश में दो दो मुद्राओं का चलन भारत जैसे घटिया देशों में ही हो सकता है। दूसरा, इसमें कहा गया है कि SAARC देशों के नागरिकों और सरकार द्वारा जारी PIO कार्ड धारकों (Person of Indian Origin) उन्हें उच्च दर नहीं देनी होगी। यानि फिर भेदभाव। एक तरफ़ तो कह रहे हैं कि फ़र्क आमदनी में असमानता की वजह से है, फिर कहते हैं कि भारतीय मूल के लोगों को उच्च दर नहीं देनी होगी। ये कौन मानेगा कि बाहरी देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों के पास बहुत पैसा नहीं है (या विदेशियों से अधिक पैसा नहीं है)? और ऐसा भी नहीं है कि सभी विदेशी बहुत अमीर होते हैं। औसत देखी जाए तो भारत में ही अधिक अमीर लोग होंगे। भारत का सचमुच न कोई दीन ईमान है, न कोई सोच। अगर कोई भारतीय भी ताजमहल देखने के लिए भारत के किसी कोने से आया है तो वो 250 रुपए भी दे देगा। उसे 15 -20 रुपए में अंदर जाने देना क्या जायज़ है। अगर कोई 100-200 रुपया कोई एतिहासिक स्थल देखने के लिए नहीं दे सकता या देना चाहता, तो वो देखकर करेगा भी क्या। मैं ये बात केवल इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ज़ोर कमाई पर दिया जा रहा है।
हाँ शोधकर्मियों, छात्रों और बूढ़ों को छूट दी जानी चाहिए।

6 comments:

आलोक said...

मैं आपकी बात से इत्तिफ़ाक रखता था, लेकिन तब तक ही जब तक खुद अमेरिका जा कर न झेला। दो सौ रुपए से नीचे का कोई टिकट है ही नहीं कहीं भी। हाँ यह ज़रूर है कि सब के लिए दाम बराबर है, पर इसे देखने का दूसरा नज़रिया यह हो सकता है कि हिंदुस्तानी लोग उन सभी जगहों की देख रेख के लिए (कम से कम आदर्श स्थिति में) कर दे रहे हैं अतः उन्हें रियायत मिलनी चाहिए।

Sanjeet Tripathi said...

बाकी सब ठीक है पर आपने "भारत जैसे घटिया देशो" का उपयोग कैसे किया, कृपया देश के साथ घटिया विशेषण का उपयोग न करें!!

रजनीश मंगला said...
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रजनीश मंगला said...

त्रिपाठी जी
क्या मैं भारत को घटिया इसलिए न कहूँ क्योंकि मैं भारतीय हूँ? आप खबरों से या ब्लॉगों से एक भी ऐसी चीज़ दिखायें जो भारत की अच्छी तस्वीर पेश करता हो। भारत एक बिकाऊ और गया गुज़रा देश है, ये सच है।

Dr Prabhat Tandon said...

भले ही यह शब्द दिल को टीस पहुँचायें , लेकिन है यह सच । हमारे दाँत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं । और यह दोगुला पन हमे अपने देश के हर क्षेत्र मे दिखता है ।
रही बात टिकटॊं के दाम मे फ़र्क की , मैने भी यहाँ लखनऊ मे रेजीडेन्सी मे देखा है कि जो टिकट आम शहरियों के लिये मात्र ५/- है वहीं विदेशियों के लिये १००/-

Sanjeet Tripathi said...

तार्किक आधार पर सही होने के बाद भी मै यही कहना चाहूंगा कि " घर में लाख बुराईयां, कमिया ही सही पर आप अपने ही घर को "घटिया" कैसे कह सकते हैं"।