यहाँ म्युनिक में भारतीय दूतावास में हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। वहाँ कभी कोई सिक्ख मैंने आज तक नहीं देखा, जबकि हर रविवार गुरूद्वार जाओ तो सैंकड़ों सिक्ख दिखते हैं वहाँ।
बात ये भी है कि ये चिट्ठी मुझे ही क्यों भेजी गई? मैंने तो हिन्दी के साथ साथ पंजाबी की भी अच्छी भली सेवा की है। ये चिट्ठी मैंने तुरंत यहाँ की criminal police को दे दी लेकिन मुझे नहीं लगता वे इस पर कुछ खास कारवाई कर रहे होंगे। कुछ हद तक तो मुझे लगता है कि इस तरह फ़ूट डलवाना इन देशों के हित में ही है। कुछ दिन पहले यहाँ के एक टीवी चैनल पर 1984 के दंगों के बारे में एक दस्तावेज़ी फ़िल्म देखी। उसमें सिक्खों के हक में बात की गई थी। कहा गया था कि इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण मंदिर तो आज़ाद करवाया, लेकिन किस कीमत पर। मारने वाले security guard (नाम याद नहीं) के घर वालों के साथ इंटरवियू दिखाया गया था। उन्हें अपने बेटे पर गर्व था, बल्कि उसकी फ़ोटो लगाकर एक गुरुद्वारा बना दिया गया जहाँ लोग आकर माथा टेक रहे थे। इन सब चीज़ों का क्या इलाज है?




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