Thursday, November 08, 2007

खालिस्तान की चिट्ठी

सभी ब्लॉगर बंधुओं को दीपावली की शुभकामनाएं। दो महीने से एक बात मन रखे रह रहा हूँ। सोचा था, नकारात्मक पोस्ट नहीं लिखूँगा। लेकिन ब्लॉग का मतलब ही यही है कि भड़ास निकाल ली जाए। करीब दो महीना पहले मेरे घर के पते पर डाक द्वारा एक चिट्ठी आई। पता हाथ से लिखा हुआ था। भेजने वाले ने अपना नाम पता नहीं लिखा था लेकिन पत्र जर्मनी से ही भेजा हुआ था, 55 cent की टिकट के साथ, जो यहाँ का देशीय शुल्क है। अंदर चार फ़ोटोस्टेट कागज़ थे जो मैं नीचे पेश कर रहा हूँ। फ़ोटो को क्लिक करके बड़े साईज़ में देख सकते हैं। इनमें खालिस्तान का प्रचार किया गया है, हिन्दूओं पर कीचड़ उछाला गया है। इतना ज़हर भारत में रहते हुए कभी महसूस नहीं हुआ था। बाहरी देशों में ही इन सरफ़िरों को हवा मिलती है ज़हर फ़ैलाने के लिए। 1984 के दंगों से मानों इन्हें बहाना मिल गया खुले आम प्रचार करने का, भेदभाव फ़ैलाने का।
यहाँ म्युनिक में भारतीय दूतावास में हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। वहाँ कभी कोई सिक्ख मैंने आज तक नहीं देखा, जबकि हर रविवार गुरूद्वार जाओ तो सैंकड़ों सिक्ख दिखते हैं वहाँ।

बात ये भी है कि ये चिट्ठी मुझे ही क्यों भेजी गई? मैंने तो हिन्दी के साथ साथ पंजाबी की भी अच्छी भली सेवा की है। ये चिट्ठी मैंने तुरंत यहाँ की criminal police को दे दी लेकिन मुझे नहीं लगता वे इस पर कुछ खास कारवाई कर रहे होंगे। कुछ हद तक तो मुझे लगता है कि इस तरह फ़ूट डलवाना इन देशों के हित में ही है। कुछ दिन पहले यहाँ के एक टीवी चैनल पर 1984 के दंगों के बारे में एक दस्तावेज़ी फ़िल्म देखी। उसमें सिक्खों के हक में बात की गई थी। कहा गया था कि इंदिरा गाँधी ने स्वर्ण मंदिर तो आज़ाद करवाया, लेकिन किस कीमत पर। मारने वाले security guard (नाम याद नहीं) के घर वालों के साथ इंटरवियू दिखाया गया था। उन्हें अपने बेटे पर गर्व था, बल्कि उसकी फ़ोटो लगाकर एक गुरुद्वारा बना दिया गया जहाँ लोग आकर माथा टेक रहे थे। इन सब चीज़ों का क्या इलाज है?

खालिस्तान का झंडा, नक्शा और नोट

खालिस्तान का ब्यौरा जर्मन भाषा में

गाँधी के बंदर?

हिन्दू वेश्यायें हालैंड में?

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