चिट्ठाकारी का मतलब ही ये है कि कोई इंटरनेट में अपने ब्लॉग पर कुछ लिखता है, हम उसे पढ़ते हैं और लिखने वाले के साथ सीधा संपर्क साध सकते हैं। ये पुराने वेबसाईटों की तरह नहीं जहाँ ढेर सारे तकनीक से अनजान लेखकों से लेख इकट्ठे किए होते हैं और उनके नाम को छोड़ कर और कुछ भी नहीं दिया होता। यानि चिट्ठाकारी लेखन का पूर्ण पारदर्शी रूप है जिसके चिट्ठाकार अपने विचार अपने नाम से, बिना किसी बिचौलिए के सीधे जनता तक पहुँचाने में समर्थ होता है। फिर क्यों हिन्दी एग्रीगेटरों में वो चिट्ठे जोड़े जाते हैं जिसमें लेखक ने अपनी पहचान छुपाई होती है। ऐसे में कैसे एक एग्रीगेटर खुद चिट्ठाकारों की आवाज़ बनने का दावा कर सकता है? ऐसे तो वो गुमनाम चिट्ठाकार दुनिया भर से सामग्री चुरा कर भी एग्रीगेटर द्वारा नाम कमा सकता है और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्या ये सही है? इसमें अच्छे बुरे लेखन का सवाल नहीं है। कम से कम ये तो पता चलता ही है लेखक खुद लिख रहा है या कहीं से टोपो मार रहा है। अगर वो हमेशा टोपो जैसी प्रविष्टियां छाप रहा है तो एग्रीगेटर को पूछना चाहिए कि भाई तुम चिट्ठाकारी कर रहे हो या टोपो अखबार चला रहे हो। एग्रीगेटरों और टिप्पणी करने वाले लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए कि जिस चिट्ठे को वो देख रहे हैं, उस व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक है या नहीं। या कम से कम क्या वो खुद के बारे में या खुद की रचनाएं लिख रहा है या नहीं।
Saturday, July 21, 2007
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9 comments:
मैं आपसे सहमत नहीं रजनीश भाई। यद्यपि मैं खुद पहचान छुपाने में विश्वास नहीं करता लेकिन व्यक्ति को उचित कारणों से भी पहचान छुपानी पड़ सकती है। (जिसमें कि व्यवसायगत कारण भी हैं)
अगर गुमनाम व्यक्ति जिम्मेदारीपूर्वक लेखन करता है तो कोई बुराई नहीं। उदाहरण के लिए हमारे सबसे पुराने गुमनाम चिट्ठाकार ईस्वामी जी को देखिए, आज तक किसी को उनके गुमनाम होने से शिकायत नहीं हुई।
अतः मुख्य बात यही है कि भले आदमी गुमनाम लिखे लेकिन लिखे जिम्मेदारीपूर्वक। मुखौटे का इस्तेमाल वह गलत कामों के लिए न करे।
ऐसे तो वो गुमनाम चिट्ठाकार दुनिया भर से सामग्री चुरा कर भी एग्रीगेटर द्वारा नाम कमा सकता है और उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
वैसे कौन सा कोई आसानी से किसी का कुछ बिगाड़ सकता है फिर वो चाहे गुमनाम हो या नामधारी।
अगर कल आपको लगे कि मैं कुछ गलत कर रहा हूँ, और फिर आपको पता चले कि श्रीश शर्मा मेरा नकली नाम है और मैं हरियाणा में भी नहीं रहता तो?
मेरा नाम जी. एल. सोनारे. मैं मुम्बई में रहता हूँ. गोकुलधाम सोसाईटी की भाग १ में १६वें माले पर. और मेरी तस्वीर वो श्रीश या उससे मिलती जुलती है, चलो उसे ही फोटोशाप में ब्लेक एंड व्हाईट कर देते हैं.
क्या अब एग्रीगेटर के लिये काफी है कि मेरी पहचान सार्वजनिक हो गई है?
भाई, इसे नहीं रोका जा सकता, टेक्निकली स्पिकिंग. मॉरेली जरुर कहा जा सकता है मगर कौन सुनेगा?? और उससे भी अहम, क्यूं सुनेगा??
मुझे नहीं लगता इस तरह बात बनेगी. यही तो वर्चयूल दुनिया का आयाम है जो इतनी सोचों को सामने ला रहा है. वरना तो सामाजिक और व्यक्तिगत दबाव के चलते कितने पहलू अनकहे ही रहे हैं अब तक.
यह मात्र मेरी सोच है. कृप्या अन्यथा न लें.
सोंच तो लाजमी है पर श्रीश भाई के विचार भी सहीं हैं ।
रजनीशजी अगर व्यक्ति का चेहरा जरूरी है विचार नहीं तो फैशन के रैंप की दुनिया अधिक स्वीकार्य हो जाएगी-
और बेनाम होना केवल भय ये ही नहीं होता वरन इसलिए भी होता है कि स्वयं लेखक भी खुद पर से नाम व परिचयों के सेंसर हटाने में विश्वास रखता है। अपना नाम या पहचान आपको पोलिटिकली करेक्ट होने की विवशता में डालते हैं अत: अंतत: हिप्पोक्रेट बना सकते हैं। वैसे भी पूरी दुनिया के आभासी रूप में बेनाम एक सम्मान प्राप्त शख्स है। उसके हाने व उसके बेनाम होने का सम्मान करना आवश्यक है।
नहीं समझ पाती हूँ
क्यों लोग गुमनाम रहना चाहते है
किस से डरते है और क्यों
क्यों छुपाते हें अपने नाम को
विचारो की अभिव्यक्ती
नाम के साथ हो
तो लगता है की हम
मानसिक रुप से आजाद हें
आपकी बात सच है श्रीमान.
भवानी के नाम से लिखा जाने वाला चिट्ठा बेनाम अपनी शिनाख्त छिपाये हुए है. ये कोई कायर है जो सब को भला बुरा कह पर्दे में छिपा है.उस पर रौशनी डाली जाय.
ये नाजाइज़ चिट्ठे प्रकाशित कर एग्रीगेटर अपनी दुकान की ग्राहकी तो बड़ा रहे हैं.लेकिन ये भी इतने ही कसूरवार हैं. इनका हाल वही है-
गोरस तो घर घर फिरे
मदिरा ठेर बिकाय.
लोगों को उसी में मज़ा आता है.
दूध के जमाने लद गये जनाब.तारीख़ में ये भी गुनेहगार होंगे.
अब तो शराब और शबाब में गोते लगाओ
और नारायन नारायन गाओ और जो भी आईना दिखाये उसे सूली पर चढ़ाओ.
जिनमें जान होगी वही शूली पर लटकाये जायेंगे.
लाश दरिया पर तैरती ही रही
डूबने की लिए ज़िन्दगी चाहिए.
आमीन.डा.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.
श्रीश जी और समीर जी, खुद की लिखी हुई पोस्ट और किसी बने बनाए लेख में अंतर साफ़ झलकता होता है। यह पहचानने के लिए किसी बुद्धिमान व्यक्ति की ज़रूरत नहीं। क्या एग्रीगेटर को इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए? ऐसे तो दुनिया भर की सामग्री को उठाकर ब्लॉग बनाए जा सकते हैं। वो लेख भी अच्छे ही होंगे लेकिन क्या उनसे चिट्ठाकारी शब्द सार्थक हो जाएगा? ऐसे ब्लॉग मैंने भी बनाए हैं लेकिन कभी किसी एग्रीगेटर के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं किया।
एग्रेगेटर की जिम्मेदारी
जिम्मेदारी लेखक की है, एग्रेगेटर की नहीं।
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