गाड़ी चलाने की अक्ल भारत में शायद ही किसी को हो। वो भी क्या करें, लाईसेंस तो घर बैठे मिल जाता है, बस पैसे की बात है। यातायात नियमों के नाम पर तमाशा और घूसखोरी है। एक चौंक पर पुलसिया होगा, अगले चौंक पर बीच सड़क में गाय बैठी होगी। ये चंडीगड़ में मैंने खुद देखा है। सड़क किनारे खड़े आदमी को कोई जोशीला नौजवान तेज़ गाड़ी से टकराकर चला जाता है। वो व्यक्ति रात भर हस्पताल में मौत की लड़ाई लड़ते हुए सुबह अपनी जान दे देता है। गाड़ी वाला पकड़ा भी जाता है तो भी उसका कोई बिगाड़ नहीं पाता है। ये है इण्डिया, और वो व्यक्ति है मेरी सगी बहन जो तीन हफ़्ते पहले चल बसीं। ऐसे मेरे ही परिवार में और रिश्तेदारी में पहले भी कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं कि सामने से अचानक कोई स्कूटर वाला आ गया, ज़ख्मी हो गया। उसका ईलाज वगैरह करवाकर भी बाद में बीस पचास हज़ार लेकर पीछा छोड़ते हैं। वहाँ कसूर नहीं गाड़ी देखी जाती है।
Saturday, June 30, 2007
इण्डिया का कोई हिसाब किताब नहीं
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9 comments:
बहन के विषय में जानकर बहुत अफसोस हुआ. ईश्वर से कामना है कि उनकी आत्मा को शांति दे और आप और आपके परिवार को इस असीम दुख को वहन करने की क्षमता प्रदान करे.
दुख की इस घड़ी में हमारी संवेदनाएँ आपके साथ हैं. भगवान दिवंगत आत्मा को शांति दे!
यातायात में ही नहीं, हर क्षेत्र में यही स्थिति है। यह हमारी सामान्य अनुशाशनहीनता और उशृंखलता का एक विशिष्ट उदाहरण मात्र है। हर क्षेत्र में व्यापक भ्रटाचार इसी अनुशाशनहीनता और संवेदनशून्यता की पैदावार है।
मेरी भी हार्दिक संवेदनाएँ।
गाड़ी चलाने की अक्ल भारत में शायद ही किसी को हो। वो भी क्या करें, लाईसेंस तो घर बैठे मिल जाता है, बस पैसे की बात है।
लगभग १००% सत्य, वाकई कोई हिसाब किताब नहीं और सड़क पर गाड़ी आदि चलाने वालों में से कुछ अपवादों को छोड़ बाकी सब घसियारे होते हैं जिनको गाड़ी चलाने की अक्ल नहीं होती। दिल्ली के इन वाहन चालकों पर मैं काफी समय से लिखने की सोच रहा हूँ।
भगवान दिवंगत की आत्मा को शांति प्रदान करें,
और आपके परिवार व आपको यह दुख सहन करने की शक्ति.
सचमुच काफ़ी दुख होता है जब कोई (अपना) अपने प्राण बिना किसी कारण खो देता है वह भी किसी अनजाने की छोटी/बड़ी गलती के कारण.
माना कि भारत में जान के बदले जान का हिसाब नहीं लिया जाता, मगर वह व्यक्ति, जिसके कारण किसी की जान गई क्या खुद से नज़रें मिला पाता होगा? या फ़िर अपने वाहन पर बैठते समय उसके हाथ न काँपते होंगे?
आपकी बहन के बारे में सुनकर दुख हुआ.
मैने भी अपने सबसे अच्छे दोस्त को ऐसे ही खोया था. किसी कार वाले नें इतनी जोर की ठोकर मारी की बस ...
उसक सपना था LLB करने का. पर सब धरा का धरा रह गया.....
भारत के गाङी चलाने वाले तो आत्मघाती रूप से गाङी चलाते हैं.
या तो खुद मरेंगे या किसी और को मारेंगे...
हालात कैसे भी हो ...हम लोग आपके साथ है रजनीश जी.
समीर जी, हिन्दी ब्लॉगर जी, अमित, विजय और हिमाँशु, संवेदनाएं प्रकट करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। किसी चीज़ के खो जाने का अहसास और दुख धीरे धीरे होते है जब उसकी कभी कभी कमी खलती है।
अपनों के इस तरह से बिछड़ने का गम मैं समझ सकता हूं. कामना है ईश्वर उनकी आत्मा को असीम शांति प्रदान करें.
रही बात भारत की तो यहां कानून कायदे सिर्फ पढ़ने और सुनाने के लिये है.
आपकी बहन के बारे में सुनकर दुख हुआ.
har jagah yeahi haal hai bharat ki to aalag he baat hai lisence to birtday gift ka hissa hota hai
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