Sunday, June 10, 2007

पैंट वाले का इलाज नहीं

मैंने पश्चिमी सभ्यता को भौतिकवादी आदि कहकर दुत्कारने वाले कुछ ब्लॉग पढ़े हैं। मुझे भौतिकवाद का मतलब अच्छी तरह नहीं मालूम, लेकिन अगर इसका अपनी तरक्की के लिए दूसरों के शोषण से कुछ मतलब है तो ये अपने देश में अधिक है। हमारे एक जानकार अच्छे सफ़ल डाक्टर हैं और अपना क्लीनिक चलाते हैं। मेरी पिछली भारत यात्रा में मैंने उन्हें हिन्दी ब्लॉगिंग के बारे में बताया और इसमें चिकित्सक व्यवासय की कुछ सामग्री बनाने के लिए अनुरोध किया। तो उन्होंने कहा कि इस प्रकार की चीज़ों की व्यक्तिगत स्तर पर तो क्या political will भी नहीं है। कोई नेता भी नहीं चाहता कि आम आदमी के हाथ में बहुत अधिक जानकारी, ताकत या जागृति आए। उनके पास ढेरों ग्रामीण लोग बिमारी के इलाज के लिए आते हैं। वो कहते हैं कि जिसने पैंट पहनी हो उसका इलाज ही नहीं करना। पढ़े लिखे लोग प्रश्न अधिक पूछते हैं और पैसा देते समय उनकी नानी मरती है जबकि ग्रामीण, अनपढ़ सीधे साधे लोग आराम से बैठते हैं, जो करने को कहो करते हैं और आराम से जितने पैसे माँगो, बिना चूँ किए देकर चलते बनते हैं। वे कहते हैं कि आज़ादी से आम आदमी के लिए कुछ भी नहीं बदला। पहले अंग्रेज़ थे, अब हम हैं। आप क्या कहते हैं? कम से पश्चिमी सभ्यता को ऐसे दुत्कारना बंद करें। खुद में दम नहीं तो दूसरों को गाली क्यों देते हैं? अपनी भाषा को संभाल नहीं पाए, अब संभालने को कुछ है भी नहीं। नौकरी करो और खुश रहो।

4 comments:

अनूप शुक्ला said...

:)

संजय बेंगाणी said...

सही लिखा है.
हम सड़को पर थूकते हैं, कहीं भी लोटा लेकर बैठ जाते है मगर महान सभ्यता का दम भरते है!
पश्चिम को दुत्काराने की जगह बहूत कुछ सिखना है.

Sunil Deepak said...

प्रिय रजनीश, मेरे लिए भौतिकवाद का अर्थ है कि साँसारिक वस्तुओं ओर सुखों की ओर अधिक ध्यान देना, क्या नया खरीदें, क्या नया पायें, क्या नया करें इस सब की लालची असीमित इच्छा. इस दृष्टि से देखो तो भौतिकता से पश्चिमी समाज तो मुग्ध था ही, आज भारत के शहरों में भी उसी का बोलबाला है. जिस शोषण की तुम बात कर रहे हो, भौतिकवाद शायद उसका एक कारण है?

हरिराम said...

शरीर(रोटी-कपड़ा-मकान), मन(काम,मनोरंजन आदि), बुद्धि(अभिव्यक्ति, स्वाधीनता, प्रतिष्ठा आदि) की आवश्यकताएँ पूरी होने के बाद ही आत्मा(शान्ति, मोक्ष) की आवश्यकता पूरी करने की जरूरत पड़ती है। इन तीनों आवश्यकताओं के भली भाँति पूरे होने पर भी अनेक अमेरिकन हिप्पी बनकर भारत चले आते हैं, आत्म-सुख की तलाश में।

भारत में अभी अनेक लोगों की शरीर की मौलिक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पाती, अतः भौतिकवाद को टाला नहीं जा सकता।